युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! आषाढ़ कृष्ण एकादशी का क्या नाम और माहात्म्य है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम योगिनी एकादशी है। इस व्रत का फल अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। सुनो, कुबेर के यक्ष सेवक हेममाली की कथा। मन्दिसमें बैठकर शिवका पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहरतक फूल आनेकी . प्रतीक्षा की | जब पूजाका समय व्यतीत हो गया तो यक्षराजने कुपित होकर सेवकोंसे पूछा-- यक्षो ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है, इस
बातका पता तो लगाओ ।' यक्षोंने कहा--राजन् ! वह तो पत्नीकी कामनामें आसक्त हो अपनी
इच्छाके अनुसार घरमें ही रमण कर रहा है। उनकी बात सुनकर कुबेर क्रोधमें भर गये और तुरंत ही हेममालीको | देर हुईं जानकर हेममालीके नेत्र भयसे व्याकुल हो रहे थे | वह
आकर कुबेरके सामने खड़ा हुआ। उसे देखकर कुबेरकी आँखें क्रोधसे
लाल हो गयीं। वे बोले--'ओ पापी ! ओ दुष्ट ! तूने अवहेलना की है, अतः कोढ़से युक्त और अपनी उस
प्रियतमासे वियुक्त होकर इस स्थानसे भ्रष्ट होकर SRA चला ST’
PN ऐसा कहनेपर वह उस स्थानसे नीचे गिर गया । उस समय उसके
हृदयमें महान् दुःख हो रहा था। कोढ़ोंसे सारा शरीर पीड़ित था। परन्तु
शिव-पूजाके प्रभावसे उसकी स्मरण-शक्ति लुप्त नहीं होती थी। पातकसे
दबा होनेपर भी वह अपने पूर्वकर्मको याद रखता था। तदनन्तर इधर-उधर
घूमता हुआ वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेऱगिरिके शिखरपर गया | वहाँ उसे तपस्याके मुनिवर मार्कण्डेयजीका दर्शन हुआ। पापकर्मा यक्षने दूरसे ही मुनिके
चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिवर उसे भयसे काँपते देख
परोपकारकी इच्छासे निकट बुलाकर कहा--'तुझे कोढ़के रोगने केसे दबा
लिया ? तू क्यों इतना अधिक Freda जान पड़ता है ?' यक्ष बोला--मुने ! मैं कुबेरका अनुचर हूँ। मेरा नाम हेममाली है।
मैं प्रतिदिन मानसरोवरसे फूल ले आकर शिव-पूजाके समय कुबेरकों दिया
करता था। एक दिन पत्नी-सहवासके सुखमें फँस जानेके कारण मुझे
समयका ज्ञान ही नहीं रहा; अतः राजाधिराज कुबेरने कुपित होकर मुझे शाप
दे दिया, जिससे मैं कोढ़से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमासे बिछुड़ गया।
मुनिश्रेष्ठ || इस समय किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मैं आपके निकट ST
अध्याय 2 — हेममाली यक्ष की कथा
ड८ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य : है! हे हुए के डे हे i पहुँचा हूँ। संतोंका चित्त स्रभावतः परोपकारमें लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधीको कर्तव्यका उपदेश दीजिये। _ मार्कण्डेयजीने कहा--तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, असत्य-भाषण
नहीं किया है; इसलिये मैं तुम्हें कल्याणप्रद ब्रतका उपदेश करता हूँ। तुम
आषाढ़के कृष्णपक्षमें 'योगिनी' एकादशीका करो | इस पुण्यसे
तुम्हारी कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायगी। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-“-ऋषिके ये वचन सुनकर हेममाली
दण्डकी भाँति मुनिके चरणोंमें पड़ गया। मुनिने उसे उठाया, इससे उसको
बड़ा हर्ष हुआ। मार्कण्डेयजीके उपदेशसे उसने योगिनी एकादशीका व्रत नाम '
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